बौद्ध धर्म विवाह Baudh Dharm Vivah Sanskar - Baudh Vivah.com | Buddhist wedding | Buddha vivah

बौद्ध धर्म विवाह Baudh Dharm Vivah Sanskar

बौद्ध धर्म विवाह Baudh Dharm Vivah Sanskar: धम्म बंधुओ शादी विवाह संस्कार जीवन में सबसे महत्वपूर्ण बौद्ध विवाह संस्कार होता है। इसे विवाह समारोह भी कहा जाता है। दो अलग-अलग फैमिली के लोग एक-दूसरे के जीवन भर के लिए रिश्ते में जुड़ जाते हैं। और हों भी न क्यों क्योकि एक सुन्दर और बेहतर जीवन के लिए यह ज़रूरी होता है।

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बौद्ध धर्म विवाह संस्कार Baudh Dharm Vivah Sanskar :

1. दोनों परिवार की इच्छा यही होती है कि एक जैसे सोच वाले हो। यदि बेटी की परवरिश दूसरे माहौल में हुई होगी, तो उसकी ज़ाहिर है उसकी सोच थोड़ा ही अलग होगी, क्योकि इस जीवन के पड़ाव पर आदत बदलकर काफी दुखी होगी। परन्तु इसके विपरीत बेटी यदि बुद्धिस्ट परिवार में परवरिश हुई हो और उसकी शादी अगर ऐसे परिवार में हो जाए है, जहां पर लोग बौद्ध धर्म विवाह संस्कार को ना फॉलो हो तो ऐसे में कई तरह की व्यवहारिक परेशानियां सामने आ सकती हैं।

2. बौद्ध धर्म विवाह संस्कार के लिए चयन प्रस्ताव भेजते समय प्रमुख रूप से (लड़के या लड़की जैसी भी स्थिति हो) का शील, स्वभाव, आचरण और शिक्षा को विशेष रूप से देखना चाहिए। जीविका के लिए लड़का क्या करता है, किस वातावरण में करता है, मौके पर पहुंचकर, साथ के लोगों से बात करके लड़के के आचरण आदि के बारे में जाना जा सकता है।

3. बौद्ध धर्म विवाह से पूर्व आयोजित संस्कार जिसे आम भाषा में सगाई कहा जाता है। वैसे बौद्ध धर्म विवाह संस्कार में ऐसा करने की कोई बाध्यता नहीं है। इस संस्कार को बुद्ध विहार में भी सम्पादित किया जा सकता है। या भिक्षु संघ की उपस्थिति में घर या बैंक्वेट हॉल में भी इस संस्कार को किया जा सकता है। वर पक्ष, कन्या पक्ष द्वारा निश्चित स्थान और समय पर पहुंचकर कन्या को समाज के समक्ष (मित्र-सापेक्ष) ज्ञान वधु के रूप में स्वीकारने के लिए अपना सहमति देते है।

बौद्ध विवाह रीति - रिवाजों के अनुसार कन्या-वर को अंगूठी, वर-कन्या को अंगूठी पहनाता है। उपस्थित लोंगों द्वारा उपहार आदि प्रस्तुत किया जा सकता है। भिक्क्षु संघ द्वारा बुद्ध वचनों से आशीर्वाद दिया जाता है। वर-वधु और उनके माता-पिता द्वारा भगवान बुद्ध को पंचाग प्रणाम और उपस्थित भिक्क्षु संघ को पंचाग प्रणाम किया जाएगा।

4. बौद्ध विवाह के लिए तिथि पक्का करने के लिए, दोनों पक्षों के बुजुर्ग आपसी सहमति से कर सकते हैं। तिथि निर्धारण करते वक़्त कुछ ख़ास बातों को ध्यान में रखना ज़रूरी है। Buddhist wedding in india.

1- बौद्ध विवाह संस्कार में फिजूलखर्ची करने से सहमत नहीं करता है अतः तिथि का निर्धारण ऐसे समय में किया जाना चाहिए जब शादी विवाह का लगन बहुत ज़्यादा नहीं हो, इस प्रकार से धन के ज़्यादा ख़र्च होने से रोका जा सकता है।

2- बहुत ज़्यादा गर्मी या बहुत ज़्यादा ठंड या फिर बारिश के मौसम में विवाह की तैयारी करना ऐसे में कठिनाई हो सकती है, इसलिए शादी की तारीख़ ऐसे टाइम पर निश्चित नहीं करनी चाहिए जिस वक़्त न बहुत अधिक ठंडी हो न अधिक गर्मी।

3- बौद्ध धर्म विवाह संस्कार के त्योहार (महत्वपूर्ण पूर्णिमा) के दिन विवाह की तिथि रखने से बचना चाहिए। क्यों कि इन दिनों बुद्ध विहार रिक्त नहीं मिलेंगे साथ ही योग्य भिक्क्षु संघ की भी उपलब्धता कठिन होगी।

4- दोनों परिवारों के आम सहमति से सामूहिक अवकाश (शनिवार, रविवार) के दिन विवाह संस्कार किया जाना सबसे उचित होगा। Buddhist wedding ceremony

5- विवाह की तिथि से एक या दो दिन पूर्व भिक्क्षु संघ को घर पर बुलायाकर परित्राण पाठ करना चाहिए।

6- विवाह संस्कार बुद्ध : विहार में भी किया जा सकता है। या बजट के रूप में मैरेज हॉल / सामुदायिक हॉल
आदि से पहले बुक करा लेना चाहिए।

7- बौद्ध विवाह (Baudh Vivah) रिवाज़ में, बौद्ध धर्म विवाह संस्कार दिन के समय किया जा सकता है यदि किसी वजह से संस्कार रात्रि में सम्पन्न किया जाना है तो प्रयास यह होना चाहिए कि विवाह संस्कार रात्रि 10:00 से 11:00 बजे तक संपन्न हो जाए। इससे अधिक लेट होने पर यह पक्का है कि विवाह में आए मेहमानों को भी ले जाया जाए, और इस प्रकार दूल्हा - दुल्हन उनके आशीर्वाद भी पा जाएंगे। साथ ही उपस्थित लोग बौद्ध विवाह की परम्परा से विवाह संस्कार भी देख सकेंगे।

पूजा की सामग्री

1. भगवान गौतम बुद्ध की मूर्ति - (मूर्ति ज़्यादा छोटी नहीं होनी चाहिए, और मूर्ति सुंदर भी होनी चाहिए)
2. अगर प्रतिमा उपलब्ध न हो तो, फोटो भी पूजा हेतु सम्मिलित किया की जा सकता है।
3. मूर्ति हमेशा ऊपर रखनी चाहिए, रखने के हेतु उचित आसन बनाएं, बौद्ध भिक्क्षु के लिए भी आसन की व्यवस्था करें।
4. सफ़ेद वस्त्र (मेज़ पर बिछाने के लिए) यथा संभव नया
5. मोमबत्ती व अगरबत्ती
6. पुष्प व पीपल के गुच्छे
7. सफेद धागा
8. मिट् टीटी का छोटा घड़ा या धातु का लोटा (स्वच्छ जल भरा हुआ।)
9. फल
10. खीर / भष्म पदार्थ / ग्लानपचो सामर्थ्य अनुसार और श्रद्धानुसार
11. जयमल वाले हार,
12. मितानन।
13. गीत- संगीत

पूजा की विधि: Baudh Dharm Vivah Sanskar

वर वधु दोनो के लिए श्वेत वस्त्र बुद्ध रीति रिवाज़ में अच्छा माना जाता है, यदि श्वेत वस्त्र न हो तो उससे मिलते जुलते वस्त्र धारण करते हैं, अक्सर बौद्ध देशो में विवाह संस्कार सफ़ेद वस्त्रों में ही संपन्न होता है। दोनो परिवारों  के माता-पिता भी सफ़ेद वस्त्र ही पहनते करते हैं, बौद्ध विवाह मंच में केवल मुख्य-मुख्य लोगों को बैठना चाहिए। बाक़ी लोग स्टेज के नीचे बैठ सकते हैं। मंच पर उपासकों को इस प्रकार बैठना चहिए कि नीचे बैठे लोगों को मंच पर हो रहे कार्यक्रम पूरी तरह से दिखाई दे।
सील या याचना
उपासकगण (एक साथ)
1. ओकास, अहं भंते! तिसरणेन सह पंचशीलं धम्मंस्मि, अनुगहं कती सीलं देथ मे भन्ते।

2. दुतियम्पी, ओकास, अहं भंते! तिसरणेन सह पंचशीलं धम्मंस्मि, अनुगहं कती सीलं देथ मे भन्ते।

3. ततियम्पी, ओकास, अहं भंते! तिसरणेन सह पंचशीलं धम्मंस्मि, अनुगहं कती सीलं देथ मे भन्ते।
भन्ते या आचार्य यमहं वदामि, तं वीलि / वदेथ।
उपासक आम, भंते या आचरियो।
भन्ते- नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मा सम्बुद्धस्स (एक बार)
उपासक- नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मा सम्बुद्धस्स (तीन बार)
भन्ते- त्रिशरण
बुद्धं सरणं गच्छामि। धम्मं सरणं गच्छामि।
संघं सरणं गच्छामि। दुतियम्पि, बुद्धं सरणं गच्छामि।
दुतियम्पि, धम्मं सरणं गच्छामि। दुतियम्पि, संघं सरणं गच्छामि।
ततियम्पि, बुद्धं सरणं गच्छामि। ततियम्पि, धम्मं सरणं गच्छामि।
ततियम्पि, संघं सरणं गच्छामि।
भन्ते- पंचशील
पाणातिपाता वेरमणी सिंक्खापदं समादियामि।
अदिन्नादाना वेरमणी सिक्खापदं समादियामि।
कामेसु मिच्छाचारा वेरमणी सिक्खापदं समादियामि।
मुसावादा वेरमणी सिक्खापदं समादियामि।
सुरामेरयमज्ज, पमादट्‌ठाना वेरमणी सिक्खापदं समादियामि।
भन्ते-
तिसरणेन सद्धिं पंचशीलं धम्मं सदुकं सुरक्खितं कती अप्पमादें सम्पादेतब्वं।
उपासकगण — आम भन्ते।

विवाह प्रक्रिया - (समर्पण-विधि)

बौद्ध परम्परा में कन्यादान नहीं होता है क्योंकि पुत्री कोई वस्तु नहीं है। दूसरे यह वर्ल्डवाइड सत्य है कि दान में दी हुयी कोई वस्तु पर दान करने वाले के बाद में कोई उस पर कोई अधिकार नहीं रहता जाता, बौद्ध धर्म में ऐसा बिलकुल नहीं है कि शादी  के बाद पुत्री से कोई रिलेशन ही न रहे, यही वजह है कि बौद्ध विवाह (संस्कार) में इसे समर्पण विधि कहा गया है, बौद्ध भिक्क्षु वर के पिता का दायाँ हाथ सीधी अवस्था में और इसके ऊपर वर का दाहिना हाथ इसी अवस्था में रखवायें वर के ऊपर कन्या का दाहिना हाथ उल्टी अवस्था में रखवायें, कन्या के पिता का दाहिना हाथ उसी अवस्था में रखवायें। यदि वर की माता उपस्थित हों तो उनका हाथ वर के पिता के हाथ के ऊपर और यदि कन्या की मां उपस्थित हो तो उनका दाहिना हाथ कन्या के हाथ के ऊपर रखवायें। हांथों के नीचे एक थाल रख दें।

(A) कन्या के मां-बाप द्वारा समर्पण- त्रिरत्न (बुद्ध-धम्म संघ) की पावन स्मृति व भावना कर , उपस्थित समाज को साक्षी मानकर हम अपनी प्रिय पुत्री को अपकी पुत्र वधु के रूप में समर्पित करते हैं। आज से इसके सुखदुख एवं सभी प्रकार माता-पिता तुल्य संरक्षण का उत्तरदायित्व आपको सौंपते हैं। हमें आशा और विष्वास है कि हमारा यह सम्बन्ध मधुर और दोनों परिवारों की सुख-समृद्धि में सहायक होगा।
स्टेज पर बैठ सभी लोगों द्वारा साधुसाधुसाधु कह कर अनुमोदन करना चाहिए।

(B) वर के माता-पिता द्वारा अनुमोदन-त्रिरत्न (बुद्ध-धम्म संघ) की पावन स्मृति व भावना कर उपस्थित समाज को साक्षी मानकर आपके द्वारा सौंपे गये उत्तरदायित्व को सहष स्वीकार करते हैं कि अपनी इस पुत्रवधु के सुख संरक्षण का पूरा ध्यान रखेंगे। हमें भी आशा और विश्वास है कि हमारा यह सम्बन्ध मधुर और दोनों परिवारों की सुख समृद्धि में सहायक होगा।

स्टेज पर उपस्थित सभी लोगों के द्वारा साधु-साधु साधु बोल कर अनुमोदन करना चाहिये।

(C) कन्या द्वारा समर्पणत्रिरत्न (बुद्ध धम्म संघ) की पावन स्मृति के साथ उपस्थित समाज को साक्षी मानकर मैं अपने को श्री.................जी की पत्नी रूप में समर्पित करती हूं, तथा इन्हें परिरूप में स्वीकर करके पुरे जीवन भर इनके साथ रहने रहने की प्रतिज्ञां ग्रहण करती हूँ, इसके उपरांत ही.. स्टेज पर उपस्थित सभी बंधुओं द्वारा साधुसाधुसाधु बोलकर अनुमोदन करना चाहिये।

(D) वर द्वारा अनुमोदनत्रिरत्न (बुद्ध धम्म संघ) की पावन स्मृति व भावना कर उपस्थित समाज को साक्षी मानकर मैं अपने को .................जी को पति के रूप में समर्तित करता हॅूं तथा इनको अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार (एक्सेप्ट) करके, ज़िन्दगी भर इनके साथ रहने की प्रतिज्ञा करता हॅूं।

स्टेज पर उपस्थित सभी लोगों द्वारा साधुसाधुसाधु कहकर अनुमोदन (अप्रूवल) करना चाहिये।

तत्पश्चात् भिक्क्षु निम्न गाथाओं को सस्वर पाठ करते हुये लोटे का जल एकत्रित हाथों पर इस तरह से डालते रहे कि जल नीचे थाल में एकत्रित होता रहे। थाल का जल पेड़ पौधों में डलवा देना चाहिये।

इच्छितं पच्छितं तुरहं रिवप्पमेव समिज्झुत।
सब्बे पूरेन्तुचित्त संकप्प चन्दो पन्नरसो यथा।।
सब्बीतियों विवज्जन्तु सब्ब रोगो विनस्सतु।
मा ते भवत्वन्तरायो सुखी दीर्घायुको भव।।
भवतु सब्ब मंगलं रखन्तुसब्ब देवता,
सब्ब बुद्धानुभावेन सदा सोत्थि भवन्तुते।
भवन्तुसब्ब मंगलं रखन्तु सब्ब देवता,
सब्ब धम्मानुभावेन सदा सोत्थि भवन्तु,
भवतु सब्ब मंगलं रखन्तु सब्ब देवता,
सब्ब संधानुभावेन सदा सोत्थि भवन्तुते।।

इसके बाद हाथों को अलग कर लें और थाली के पानी को पेड़ व पौधों में डलवा दें।

वर के द्वारा ली जाने वाली प्रतिज्ञाएं:

बौद्ध भिक्षु के द्वारा पांच पवित्र प्रतिज्ञायें ग्रहण करायी जाये।

1. मैं मेरी पत्नी का सदा आदर-सम्मान करने की प्रतिज्ञा ग्रहण करता हॅूं।

2. मैं कभी भी अपनी पत्नी का अपमान नहीं करूँगा और न ही किसी अन्य से अपमानित होने दूंगा, ऐसी प्रतिज्ञा ग्रहण करता हॅूं।

3. मैं मिथ्या आचरण (गलत आचरण) नहीं करने की प्रतिज्ञा ग्रहण करता हॅूं।

4. मैं आपको सम्यक आजीविका (रोजी रोटी) द्वारा कमाये धनदौलत से संतुष्ट रखने की प्रतिज्ञा ग्रहण करता हॅूं।

5. मैं आपको अलंकार (साज सृंगार) आदि देकर संतुष्ट रखने की प्रतिज्ञा ग्रहण करता हॅूं।

मैं इन पांचों प्रातिज्ञाओं का पूर्ण पालन करूगा। Baudh Dharm Vivah Sanskar

वधू द्वारा की जाने वाली प्रतिज्ञाएं:

त्रिरत्न की पावन - स्मृति व भावना कर यहाँ उपस्थित समाज को साक्षी मानकर मैं प्रतिज्ञा करती हॅूं।

1. मैं अपने पति का सदा सम्मान करने की प्रतिज्ञा ग्रहण करती हॅूं।

2. मैं परिजन व परिवार के लोगो की भलि-भांति देख-रेख करने की प्रतिज्ञा गृहण करती हॅूं।

3. मैं मिथ्या आचरण (गलत आचरण) से विरत से दूर रहकर अपने पति की वफ़ादार रहने की प्रतीज्ञा ग्रहण करती हॅूं।

4. मैं आपके उपार्जित (कमाए हुआ) धन दौलत की रक्षा करने की प्रतिज्ञा गृहण करती हॅूं।

5. मैं घर के सभी कार्यों में दक्ष (परफेक्ट) और आलस्य (लेज़ी) रहित रहने की प्रतिज्ञा गृहण करती हॅूं।

स्टेज पर मौजूद सम्मानित सभी जाति के बंधुओं के हांथों में फूलों की पंखुड़ियां पकड़ा दी जायें। भिक्क्षु संघ जय मंगल (साकुशल) उट्‌ठगाथा का पाठ करेंगे।

जय मंगल अट्‌ठागाथा:


जय मंगल अट्‌ठागाथा:
भिक्क्षु संघ
बाहु सहस्समभि निम्मित सावुधन्तं, गिरिमेखलं उदित घोर ससेन मारं। दानादि धम्मविधिना जितवा मुनिन्दो, तं तेजसा भवतु ते जयमंगलानि।1। मारतिरेक मभियुज्झित सब्बरत्तिं, घोरम्पनालवक मक्खमथद्ध—यक्खं। खन्ती सुदन्तविधिना जितवा मुनिन्दो, तं तेजसा भवतु ते जयमंगलानि ।2। नलागिरिं गजवरं अतिमत्ति भूतं, दावग्गि चक्कमसनीव सुदारूणन्तं। मेत्तम्बुसेक विधिना जितवा मुनिन्दो, तं तेजसा भवतु ते जयमंगलानि ।3। उक्खित्त खग्गमतिहत्थ सुदारूणन्तं, धावन्ति योजनपथं अंगुलिमालवन्तं, इद्धीभिसंखत मनो जितवा मुनिन्दो, तं तेजसा भवतु ते जयमंगलानि।4। कत्वानि कट्‌ठमुदरं इव गब्भिनीया, चिञ्‌चाय दुट्‌ठवचनं जनकाय मज्झे। सन्तेन मोम विधिना जितवा मुनिन्दो, तं तेजसा भवतु ते जयमंगलानि।5। सच्चं विहाय—मतिसच्चक वादकेतुं, वादाभिरोपितमनं अतिअन्धभूतं। पञ्‌ञापदीपजलितो जितवा मुनिन्दो, तं तेजसा भवतु ते जयमंगलानि।6। नन्दोपनन्द भुजगं विवुधं महिद्धिं, पुत्तेन थेर भुजगेन दमापयन्तो। इद्धूपदेस विधिवा जितवा मुनिन्दो, तं तेजसा भवतु ते जयमंगलानि।7। दुग्गहदिट्‌ठ भुजगेन सुदट्‌ठ हत्तं, ब्रह्मं विसुद्धि जुमिद्धि, वकाभिधानं। ञाणगदेन विधिना जितवा मुनिन्दो, तं तेजसा भवतु ते जयमंगलानि।8। एतापि बुद्ध जयमंगल अट्‌ठागाथा, यो वाचको दिनदिने सरते मतन्दी। हित्वाननेक विविधानि चुप्पद्ववानि, मोक्खं सुखं अधिगमेय्य नरो सपञञो।9।
प्रत्येक बार जब तं तेजसा भवतु ते जय मंगलानि के उच्चारण के साथ वर वधू पर पुश्प वर्शा करेंगें। अंत में ''विवाह कार्य सम्पन्नो, वर वधु सुखी होन्तु'' का उच्चाण करते हुये महामंगल सुत्त का पाठ किया जायेगा। उपस्थित लोग वर - वधु को भेंट - उपहार आदि यदि कुछ देना चाहें तो इस समय दे सकते है। मंगलसूत्र को तिहरा कर वर-वधु के हाथ में और वधु वर के हाथ में बांध दे।

मीठे से सभी का मुंह मीठा कराया जाये: वर - वधु द्वारा संस्कार में उपस्थित भिक्क्षु संघ को यथा सामर्थ दान दिया जाये। मातापिता द्वारा भी भिक्क्षु संघ को यथा सामर्थ दान दिया जाये।

वर वधु को माता-पिता और सास-सासुर के चरण स्पर्श करते हुए आशीर्वाद लेना चाहिए। टूओपरेंट अटेंडेंट बंधों को यथा जोड़कर नमो बुद्धाय कहना चाहिए। जाति बंधुओं द्वारा हाथ उठाकर साधु - साधु कहना चाहिए।

पचांग प्रणाम- अर्थात प्रणाम करते समय शरीर के पॉच अंग पृथ्वी पर स्पर्श करना चाहिए।
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